साक्षात्कार : समाज सेवी के रूप में जीने की चाह – (प्रो.)डा. राजू वैश्य

(प्रो.)डा. राजू वैश्य नयी दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में आर्थोपेडिक्स एवं ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के वरिष्ठ कंसल्टेंट हैं। देश के प्रमुख आर्थोपेडिक्स सर्जनों में शुमार डा. राजू वैश्य एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जीवन जीना पंसद करते हैं। मात्र 29 साल की उम्र में आर्थोपेडिक्स सर्जन बनने वाले डा. राजू वैश्य की खेलों में काफी रूचि रही है और वह तैराकी एवं टेनिस के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं। बचपन से लेकर एक सफल आर्थोपेडिक्स सर्जन बनने के बारे में उनके अनुभव एवं विचारों को जानने के लिये पूनम तोषामड उनसे रूबरू हुयी।

डॉक्टर के प्रोफेशन को चुनने के पीछे आपका क्या उद्देश्य था?
मैं बचपन से ही समाज के लिए कुछ करना चाहता था। समाज सेवा करने की चाह हमेशा से मन में रही कि समाज को दर्द, दुख और पीड़ा से मुक्त कराना जरूरी है। एक डॉक्टर ही यह कार्य भली-भांति कर सकता है। ऐसी भावना जब एक छोटे बच्चे में उत्पन्न होगी तो वह निश्चित ही समाज के लिए कुछ अच्छा कर सकता है। हालांकि इसके लिए उसे बहुत अधिक मेहनत भी करनी पड़ती है क्योंकि डॉक्टर बनना आसान नहीं है। जितनी मेहनत और संघर्ष आपको डॉक्टर बनने के लिए करना पड़ता है उतना और किसी प्रोफेशन में नहीं करना पड़ता है।

आपको इस प्रोफेशन में किस तरह का संघर्श करना पड़ा?
जब कोई बच्चा यह निर्णय ले लेता है कि उसे डॉक्टर ही बनना है तो वह यह बात भली-भांति जानता है कि इसके लिए उसे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यदि आपको एक अच्छा डॉक्टर बनना है तो सब्र से काम लेते हुए ज्यादा से ज्यादा मेहनत करनी होगी, अपने विषय को ज्यादा से ज्यादा गंभीरता से समझना होगा। मेडिकल की पढ़ाई में अन्य प्रोफेशन की तुलना में अधिक समय लगता है चाहे इंजीनियरिंग हो या चार्टर्ड एकाउटेंशी या अन्य प्रोफेशन और परिणाम बहुत बाद में मिलते हैं। एक डॉक्टर को अपनी जिंदगी में कम से कम 15-20 साल गंभीरता से काम करना होता है तब उसे पहचान मिलती है या वह खुद को स्थापित कर पाता है। इसलिए डॉक्टर बनने में ज्यादा संघर्ष ही नहीं, मेहनत जरूरी भी है।

आपको इस प्रोफेशन से जुड़े कितने साल हो चुके हैं?
मैंने 1977 में मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। उसके बाद 1983 में आर्थोपेडिक्स में आया। तब से इस क्षेत्र में सक्रिय हूं।
एक डॉक्टर के रूप में अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या देखते हैं?
एक डॉक्टर के लिए उसके रोगी का स्वस्थ होना, बड़े से बड़े या कठिन ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देना एक बड़ी उपलब्धि है। किंतु मुझे अपने जीवन की चुनौतीपूर्ण उपलब्धि यह लगती है कि मैं अब तक का सबसे कम उम्र का आर्थोपेडिक सर्जन बना। मैं मात्र 29 साल में आर्थोपेडिक सर्जन बन गया और मुझे अब तक कई गोल्ड मेडल मिल चुके हैं, कई पेपर भी प्रकाशित हुए हैं और कई लेक्चर भी दिए हैं।
प्रोफेशनल जिंदगी से अलग आप किस तरह का जीवन जीना चाहेंगे?
मैं एक सोशल वर्कर के रूप में अपना जीवन जीना चाहूंगा।
आप किस प्रकार का सामाजिक कार्य करना चाहेंगे?
सोशल वर्कर के तौर पर मैं एक स्वयं सेवी संस्था से जुड़ा हूं। ऑर्थो केयर फाउंडेशन नामक इस संस्था के माध्यम से हम लगातार काफी गतिविधियां करते रहते हैं जैसे- हड्डियों की बीमारी के बारे में जानकारी देना, उनका ईलाज करना, फ्री हेल्थ कैम्प लगाना, मरीजों की आर्थिक सहायता करना आदि। एक डॉक्टर होने के नाते एक मरीज की जो भी सहायता मैं कर सकता हूं, करता हूं।
आपकी कोई हॉबी भी है और क्या आपने कभी किसी खेल में भागीदार की है?
स्पोर्ट्स में मेरी रुचि है जिसमें क्रिकेट, टेनिस, स्वीमिंग, शुतरंज आदि मुख्य है। मैंने यूनिवर्सिटी में 1977 में नेशनल स्वीमिंग में भागीदारी की थी। यूनिवर्सिटी में क्रिकेट और शुतरंज भी खेला। टेनिस में दो साल तक मध्य प्रदेश से डबल स्टेट प्लेयर रहा हूं।
आपकी दिनचर्या क्या है?
सुबह साढ़े चार बजे उठता हूं। साढ़े पांच से 7 बजे तक टेनिस खेलता हूं। फिर स्वीमिंग करता हूं। उसके बाद अस्पताल जाता हूं। रात को साढ़े नौ बजे सो जाता हूं।
इतनी व्यस्त दिनचर्या में अपने परिवार के साथ कैसे समय व्यतीत करते हैं? क्या आपको कभी यह बात खलती नहीं है कि अपने परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं ?
मैं परिवार को सुबह आधे घंटे का और रात में एक घंटे का समय देता हूं। हमलोग नाश्ता और रात का भोजन एक साथ ही करते हैं। परिवार को भी धीरे-धीरे ये सब बातें समझ में आ जाती है कि मैं इससे अधिक समय उन्हें नहीं दे सकता।
जब आप खुद इतनी व्यस्त जिंदगी जीते हैं तो क्या आप चाहेंगे कि आपकी संतान भी इसी पेशे में आए?
मेरा बड़ा बेटा मेडिकल के क्षेत्र में ही है। वह नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में आर्थोपेडिक सर्जन के रूप में काम कर रहा है। उसने अपनी मर्जी से इस लाइन को चुना है। छोटा बेटा इंजीनियरिंग के क्षेत्र में है।
आपको क्या लगता है कि आज की पीढ़ी को अपने करियर का चुनाव खुद करना चाहिए या पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते आ रहे पेशे को अपनाना चाहिए?
उन्हें वही करना चाहिए जिसमें उनकी रुचि हो या टैलेंट हो क्योंकि आज हर प्रोफेशन में बहुत स्कोप है। आप किसी भी प्रोफेशन में अच्छा कर सकते हैं अगर उसमें आपकी रुचि हो। बस, कड़ी मेहनत की जरूरत है। किसी की नकल या दबाव में किसी प्रोफेशन का चुनाव नहीं करना चाहिए क्योंकि जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति किसी प्रोफेशन में कामयाब हो जाए तो आप भी कामयाब हो जाएंगे।
आपको साहित्य या संगीत से भी कभी लगाव रहा है?
नहीं, साहित्य या संगीत में मेरी रुचि नहीं है। बचपन में मां ने वायलिन सीखने के लिए स्कूल में दाखिला करा दिया था लेकिन वायलिन में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए शिक्षक ने यह कहकर निकाल दिया कि यह वायलिन नहीं सीख सकता। दरअसल मेरे जीवन का लक्ष्य तो एक सफल डॉक्टर बनना था।

देश के प्रमुख आर्थोपेडिक्स सर्जन (प्रो.)डा. राजू वैश्य नयी दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में आर्थोपेडिक्स एवं ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के वरिष्ठ कंसल्टेंट हैं। उन्होंने सबसे कम उम्र में 29 साल में लिवरपुर युनिवर्सिटी से आर्थोपेडिक्स सर्जरी में एम सीएच आर्थो उच्चतम उपाधि हासिल की। डा. वैश्य टोटल ज्वाइंट रिप्लेसमेंट और आर्थोस्कोपी सर्जरी के अग्रणी शल्य चिकित्सक हैं। वह भारत, बंगलादेश, नेपाल, अफगानिस्तान और इराक के आर्थोपेडिक्स सर्जनों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते हैं। उन्होंने आर्थराइटिस के मरीजों के लिये आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन नामक स्वयं सेवी संगठन की स्थापना की है।

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