बहुत अधिक चंचल और शरारती बच्चे अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) का शिकार हो सकते हैं


नौएडा स्थित मानस गंगा क्लिनिक ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस तथा विश्व एडीएचडी जागरूकता माह के सिलसिले में एडीएचडी की जारूकता के लिए पहल की

नौएडा, 09 अक्तूबर : अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) बहुत ही सामान्य बाल मानसिक विकार है जिसके कारण बच्चों में एकाग्रता की कमी हो जाती है और वे बहुत अधिक चंचल एवं शरारती हो जाते हैं और इस विकार के कारण बच्चों के मानसिक विकास एवं उनकी कार्य क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अगर बच्चे पढ़ाई या किसी अन्य काम में अपना ध्यान नहीं लगा पाते, बहुत ज्यादा बोलते हों, किसी भी जगह टिक कर नहीं बैठते हों, छोटी-छोटी बातों पर बहुत अधिक गुस्सा करते हों, बहुत अधिक शरारती और जिद्दी हों तो वे अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर से ग्रस्त हो सकते हैं। अक्सर माता-पिता इस विकार से ग्रस्त बच्चे को काबू में रखने के लिए उनके साथ डांट-फटकार और मारपीट का सहारा लेते हैं लेकिन इसके कारण बच्चों में नकारात्मक सोच आ जाती है और वह पहले से भी ज्यादा शरारत करने लगते हैं।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर नौएडा के मानस गंगा क्लिनिक में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. मनु तिवारी ने कहा कि अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर का इलाज आसान है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे बच्चे की सही समय पर पहचान हो और उसे इलाज के लिए मनोचिकित्सकों के पास लाया जाए। माता-पिता को चाहिए कि अगर उन्हें अपने बच्चे में एडीएचडी के लक्षण दिखे तो वे बच्चे के साथ डांट-डपट करने या बच्चे की शरारत की अनदेखी करने के बजाए मनोचिकित्सक से परामर्श करें और अपने बच्चे को ठीक होने का मौका दें।
गौरतलब है कि अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर के बारे में जागरूकता कायम करने के उद्देश्य से अक्तूबर विश्व एडीएचडी जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि नौएडा के मानस गंगा क्लिनिक ने अब तब इस समस्या से ग्रस्त सैकड़ों बच्चों को ठीक होने में मदद की है। मानस गंगा क्लिनिक का लक्ष्य है कि समाज में इस बीमारी के प्रति जागरूकता आए और इस समस्या से ग्रस्त बच्चे को इलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास लाया जा सके ताकि बच्चे अपनी पूरी क्षमता को हासिल कर सकें।

डॉ. मनु तिवारी ने बताया कि इस समस्या के कारण बच्चों में आत्म विश्वास की कमी हो सकती है, बच्चों में उदासीनता (डिप्रशन) और चिडचिड़ापन जैसी समस्या हो सकती है और बच्चे की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है इसलिए ऐसे बच्चे का समय पर इलाज कराना चाहिए।
मानस गंगा क्लिनिक एवं मेट्रो हास्पीटल्स की मनोचिकित्सक डॉ. अवनी तिवारी का कहना है कि सबसे पहले लक्षणों की पहचान होते ही अभिभावकों को इस बीमारी के प्रति जागरुक होना पड़ेगा। बच्चे के अलावा अभिभावकों की काउंसलिंग की जरुरत होती है। इसके इलाज से पूर्व बच्चे की क्लिनिकल एवं साइकोलॉजिकल जांच की जाती है। इसके आधार पर काउंसलिंग की जाती है। बिहैवियर थिरेपी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर दवाइयां दी जाती है जो बच्चों में एकाग्रता बढ़ाने में मददगार साबित होती है।
बाल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रेखा मित्तल बताती हैं कि इस समस्या से ग्रस्त बच्चों की जिन लक्षणों के आधार पर पहचान की जा सकती है वे हैं – एकाग्रता की कमी, ध्यान में कमी, अति चंचलता, अति आवेग, स्कूल में पढ़ाई में कमजोर, स्कूल में अक्सर चीजें छोड़ कर आना, एक जगह पर शांत नहीं बैठना, जानकारी एवं बौद्धिक क्षमता के बावजूद परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं आना, किसी भी कार्य से जल्दी मन उचट जाना, तेज गुस्सा आना, स्कूल और खेल मैदान में बात-बात पर झगड़ा करना, धैर्य की कमी और खेल-कूद में अपनी बारी आने का इंतजार नहीं कर पाना।
डॉ. मनु तिवारी कहते हैं कि मुख्य तौर पर आनुवांशिक कारणों से यह समस्या उत्पन्न होती है। यह देखा गया है कि जिन बच्चों में यह समस्या होती है वे स्मार्ट फोन आदि का बहुत अधिक इस्तेमाल करते हैं। आधुनिक जीवन शैली तथा भागदौड़ भरी अत्यंत व्यस्त जिंदगी के कारण अक्सर माता-पिता बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते। शहरों में एकल परिवार में अक्सर बच्चे अकेलेपन से जूझ रहे हैं। इन सब कारणों से बच्चे गुस्सैल, चिड़चिड़े या हाइपर एक्टिव हो रहे हैं। कई माता-पिता जागरूकता के अभाव में अपने बच्चों में पनप रही हाइपर एक्टिविटी को या तो पहचान नहीं पाते या उसकी अनदेखी कर देते हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) के बारे में लोगों में तथा चिकित्सकों में अधिक जागरूकता आई है और इस कारण पहले की तुलना में आज अधिक बच्चे इलाज के लिए मनोचिकित्सकों के पास लाए जाने लगे हैं।
विभिन्न अध्ययनों के अनुसार स्कूल जाने वाले 2 से 14 प्रतिषत बच्चे एडीएचडी से ग्रस्त होते हैं और लड़कियों की तुलना में लड़कों में यह समस्या अधिक पाई जाती है।
माता-पिता के लिए ध्यान देने योग्य बातें
— डांट या मार समस्या का समाधान नहीं है।
— माता-पिता को चाहिए कि हाइपरएक्टिव बच्चे की उर्जा को बचपन से ही सकारात्मक काम में लगाने की कोशिश करें। अगर ऐसे बच्चों की उर्जा को सही दिशा में लगाया जाए वे बहुत ही इनोवेटिव काम कर सकते हैं।
— माता पिता को जितना मुमकिन हो उतना बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए।
— अगर बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता है तो इसमें मदद करनी चाहिए।
— एडीएचडी से ग्रस्त बच्चे अपने माता-पिता एवं शिक्षकों का पूरा अटेंशन चाहते हैं।
— अगर माता-पिता उनकी तरफ ध्यान देंगे, तो वे एग्रेसिव नहीं होते हैं।
— बेहतर है कि उसे अकेले में प्यार से समझाएं कि कब कौन सा काम उसे करना चाहिए और कौन सा नहीं।
— कई बार हाइपर एक्टिव बच्चे पैरेंट्स का ध्यान अपनी तरफ करने के लिए बार-बार सवाल पूछते हैं।

Vinod Kumar

Health Journalist & writer. Editor of monthly health magazine "Health Spectrum."